ख्रीस्तीय जीवन की प्रसव-पीड़ा

स्तोत्र 90:10 में हम पढ़ते हैं, ”हमारी आयु की अवधि सत्तर बरस है, स्वास्थ्य अच्छा है, तो अस्सी बरस। हम अपनी अधिकांश आयु कष्ट और दुःख मे बिताते हैं”। दुख-तकलीफ़ हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। कष्ट और क्लेश के समय हम में से अधिकत्तर लोग विचलित हो जाते हैं। मगर प्रेरित इसलिए आनन्दित होते थे कि वे प्रभु येसु के नाम के कारण अपमानित होने योग्य समझे गये (देखिए प्रेरित-चरित 5:41)। वे ”शिष्यों को ढारस बँधाते और यह कहते हुए विश्वास में दृढ़ रहने के लिए अनुरोध करते थे कि हमें बहुत से कष्ट सह कर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना है” (प्रेरित-चरित 14:22)

पवित्र बाइबिल हमारे दुख-दर्द की तुलना एक महिला की प्रसव-पीड़ा से करती है। इसलिए हमें अपने जीवन में आनेवाले दुख-तकलीफ़ों को प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए। हमें अपने जीवन की कठिनाइयों को ईश्वर के दण्ड के रुप में कभी भी नहीं देखना चाहिए। बल्कि हमें उसन्हें ईश्वर की आशिष की तैयारी के रूप में देखना चाहिए। यह पीड़ा एक नए जीवन के आगमन से जुडी है।

नबी इसायाह (26:17-18) इस्राएली लोगों के जीवन में आनेवाली विपत्तियों को एक नये युग के जन्म की वेदना बताती है। मत्ती 24:8 में येसु युद्ध, अकाल और भूकंप को "प्रसव की पीड़ाओं की शुरुआत" कहते हैं। योहन 16:21 में अपने शिष्यों को सान्त्वना देते हुए प्रभु येसु कहते हैं, ”प्रसव निकट आने पर स्त्री को दुख होता है, क्योंकि उसका समय आ गया है; किन्तु बालक को जन्म देने के बाद वह अपनी वेदना भूल जाती है, क्योंकि उसे आनन्द होता है कि संसार में एक मनुष्य का जन्म हुआ है।” जिस प्रकार विश्वासी अपने भीतर कराहते हैं, उसी प्रकार यह पीड़ा सारी सृष्टि में भी विद्यमान है। रोमियों 8:22 में संत पौलुस कहते हैं, ”हम जानते हैं कि समस्त सृष्टि अब तक मानो प्रसव-पीड़ा में कराहती रही है और सृष्टि ही नहीं, हम भी भीतर-ही-भीतर कराहते हैं”। मानव-इतिहास भी एक अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है - नया आकाश और नई पृथ्वी।

जिस प्रकार प्रसव वेदना का एक निश्चित आनन्दमय अंत होता है, उसी प्रकार हमारे दुख-दर्द का भी एक आनन्दमय अन्त होगा। हमें उस आनन्द की प्रतीक्षा में इस दुनिया में आनेवाले दुख-संकटों को झेलना चाहिए। पवित्र वचन कहता है कि प्रभु येसु ने “भविष्य में प्राप्त होने वाले आनन्द के लिए क्रूस पर कष्ट स्वीकार किया और उसके कलंक की कोई परवाह नहीं की” (इब्रानियों 12:)। रोमियों 8:!8 में संत पौलुस कहते हैं, ”मैं समझता हूँ कि हम में जो महिमा प्रकट होने को है, उसकी तुलना में इस समय का दुःख नगण्य है”। आइए, हम अपने जीवन में आनेवाली कठिनाईयों को सहर्ष स्वीकार करें।

✍ - फादर फ्रांसिस स्करिया