बोने वाले ईश्वर

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जैसे ही पौधों पर फूल लगते हैं और फिर दाने, उस के चेहरे पर रौनक आती है और वह अपने घर के आँगन की ठण्डी हवा से ज्यादा अपने खेत की लू को पसन्द करने लगता है। दाने पकने पर वह अपने और अपनों के उज्ज्वल भविष्य के न जाने कितने सपने देखते लगता है। अगर प्राकृतिक आपदाओं, कीड़े-मकोड़ों के आक्रमण, पानी की कमी या खाद के अभाव के कारण पौधे फल उत्पन्न करने योग्य नहीं बनते हैं तो कृषक को कितनी ठेस पहुँचती है? कभी-कभी सब कुछ ठीक रहता है, परन्तु कटनी पर यह मालूम होता है कि बालों में दाने नहीं हैं। इस खोखलेपन से किसान कितना दुखी होता होगा!

मेरा विचार है कि इस प्रक्रिया के प्रथम चरण में मिट्टी बीज को चाहती है और उसे ग्रहण करने के लिए अपने को तैयार करती है। किसान ज़मीन को फाडता है। इस दर्द-भरे अनुभव से मिट्टी को गुजरना ही पडता है। इस के बिना ज़मीन के काँटे दूर नहीं होंगे, मिट्टी में पौधों की जड़ नहीं घुस सकेंगी। तत्पश्चात वह मिट्टी बेसब्री से बीज का इंतजार करती है। जैसे ही बीज बोया जाता है, मिट्टी उस को अपनाती है। उसी के साथ-साथ मिट्टी और बीज के बीच एक प्रकार की साझेदारी शुरू होती है। मिट्टी पौधे की जड़ों को स्वीकार कर लेती है और उसे हृदयंगम कर लेती है। जड़ें मिट्टी की गहराई तक पहुँच जाती हैं और पौधे को मजबूती और ताकत प्रदान करती हैं। कभी-कभी मिट्टी में इतनी नरमी होती है कि पौधे को बारिश की प्रतीक्षा भी नहीं करनी पड़ती है और न हीं सिंचाई की जरूरत होती है। अच्छे फलों को देख कर गौरवान्वित होने वाले कृषक के पुण्य चरण-स्पर्श अनुभव करते ही मिट्टी पुलकित हो उठती है।

बाइबिल के पन्ने पलटते समय हमें ईश्वर में इसी प्रकार का किसान दिखायी देता है। पूरा धर्मग्रन्थ खेत और बीजो के दृष्टान्तों से भरा पड़ा है। हमारे हृदयों में ईश्वर स्वर्गराज्य के बीज बोते जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि वे अंकुरित होकर हमारे अन्तरतम में जड़ पकडकर फल उत्पन्न करेंगे। हमारे जीवन में वचन रूपी बीजों को बड़ी लगन तथा तत्परता से ग्रहण करने हेतु हमें अपने हृदयों को तैयार करना चाहिए। पवित्र ग्रन्थ कहता है, “अपनी पडती ज़मीन को जोतो और काटों में बीज मत बोओ” (यिरमियाह 4:3)। हमें अपने हृदयों से पापों के कँटीले झाडों को उखाड कर फेंकना चाहिए। फिर हमें पवित्र आत्मा रूपी पावन जल से हमारे हृदयों को सींचना चाहिए। हमें दुरात्मा रूपी कीडे-मकोडों से हमारे आध्यात्मिक पौधों को बचाना चाहिए। सार्वजनिक सद्भाव से ईश्वर रूपी सूरज सभी लोगों पर बरसाने वाले किरणों का लाभ उठा कर हमें अपने पौधों को बडी आशा प्रदान करना चाहिए। इस प्रकार के दृढ़संकल्प एवं मेहनत के उपरान्त हम फल खोजनेवाले स्वामी के चरण-स्पर्श के लिए उत्कण्ठा से प्रतीक्षा कर सकते हैं।

-फ़ादर फ़्रांसिस स्करिया