click here for मिशन रविवार 2019 के लिये सन्त पापा फ्रांसिस का सन्देश

Ne Plus Ultra

Ne Plus Ultra. यह वाक्यांश जिब्राल्टर की जलसंधि के दोनों ओर हरक्यूलिस के स्तंभों पर उत्कीर्ण किया गया था। यह नाविकों के लिए एक चेतावनी थी कि “आगे और कुछ नही है”। इसका मतलब यह था कि आगे भूमि नहीं है। स्पेन के कई सिक्कों पर भी यह वाक्यांश मुद्रित था। लोगों का मानना था कि आगे कोई भूमि नहीं है। लेकिन इटली के क्रिस्टोफ़र कोलम्बस इस बात को आसानी से मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने आगे खोज करने का निर्णय लिया। कुछ नाविकों के साथ उन्होंने सन 1492 में स्पेन से एक साहसिक यात्रा शुरू की। इस यात्रा के दौरान कोलम्बस और साथियों ने बहामस द्वीप तथा क्यूबा खोज निकाला। फिर आगे चल कर अमरिका पहुँच कर वहाँ स्पेन का झंडा फहराया। जैसे अमरिका की खोज की खबर यूरोप के निवासियों को प्राप्त हुई, स्पेन के नये सिक्कों पर Plus Ultra अंकित होने लगा जिसका मतलब है आगे बहुत कुछ है।

प्रभु येसु के साथ ही ऐसा ही कुछ हुआ था। सैनिकों ने येसु को क्रूस पर चढाया और मार डाला और उनकी लाश को एक कब्र में रख दी। उन्होंने सोचा था कि सब कुछ खत्म हो गया। परन्तु येसु तीसरे दिन जी उठे। उन्होंने यह स्थापित किया किया कि आगे बहुत कुछ है। प्रभु येसु ने अपने पुनरुत्थान से यह साबित किया कि मृत्यु से हमारे जीवन का विनाश नहीं होता, बल्कि विकास होता है। मृत्यु पर हमारे जीवन का अन्त नहीं होता बल्कि एक नया जीवन शुरू होता है। प्रभु का वचन कहता है, “मृत्यु! कहाँ है तेरी विजय? मृत्यु! कहाँ है तेरा दंश? मृत्यु का दंश तो पाप है और पाप को संहिता से बल मिलता है। ईश्वर को धन्यवाद, जो हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा हमें विजय प्रदान करता है!” (2कुरिन्थियों 15:55-57)

कुछ लोगों का यह मानना है हमारा जीवन इस दुनिया तक ही सीमित है और 70-80 साल के जीवन के बाद हम मर मिटेंगे। उसी से सब कुछ समाप्त होता है। स्तोत्र ग्रन्थ में लिखा हुआ है, “हमारी आयु की अवधि सत्तर बरस है, स्वास्थ्य अच्छा है, तो अस्सी बरस” (स्तोत्र 90:10)। परन्तु पवित्र वचन यह भी कहता है, “यदि मनुष्य की आयु एक सौ वर्ष है, तो वह बहुत मानी जाती है; किन्तु अनन्त काल की तुलना में ये थोड़े वर्ष समुद्र में बूँद की तरह, रेतकण की तरह हैं।“ (प्रवक्ता 18:8) स्तोत्र 116:8-9 में पवित्र वचन कहता है, “उसने मुझे मृत्यु से छुड़ाया। उसने मेरे आँसू पोंछ डाले और मेरे पैरों को फिसलने नहीं दिया, जिससे मैं जीवितों के देश में प्रभु के सामने चलता रहूँ।“

लूकस 13:11 हम अठारह साल से झुकी हुयी महिला को पाते हैं जिसे प्रभु येसु चंगा करते हैं। योहन 5 में हम एक अडतीस साल बीमार व्यक्ति को पाते हैं जो येरूसालेम में भेड़-फाटक के पास बेथेस्दा नामक कुण्ड के पास एक मण्डप में पडा हुआ था। उसे येसु चंगा करते हैं। योहन 9 में प्रभु येसु एक जन्मान्ध को चंगा करते हैं। जब प्रभु ने उसे चंगा किया, तब उसकी आयु 40 साल से ज़्यादा थी। योहन 11 में प्रभु येसु मृत्यु के 4 दिन बाद उसे जिला देते हैं। प्रेरित-चरित अध्याय 3 में हम एक मनुष्य को पाते हैं, जो जन्म से लँगड़ा था। लोग उसे प्रतिदिन ला कर मन्दिर के ‘सुन्दर’ नामक फाटक के पास रखा करते थे, जिससे वह मन्दिर के अन्दर जाने वालों से भीख माँग सके। इस प्रकार जब हम को लगता है कि हम उस मोड तक पहुँच गये हैं, जहाँ से बचना असंभव है और हमारा बर्बाद होना तय है, वहीं ईश्वर अपने शक्तिशाली हाथों से हमें छुडाते हैं। यह है हमारे दैनिक जीवन में पुनरुत्थान का अनुभव।

स्तोत्र 18:5-20 हम पढ़ते हैं, “मैं मृत्यु के पाश में पड़ गया था, विनाश की प्रचण्ड धारा में बह रहा था। मैं अधोलोक के जाल में फँस गया था, मेरे लिए मृत्यु का फन्दा बिछाया गया था। मैंने अपने संकट में प्रभु को पुकारा, मैंने अपने ईश्वर की दुहाई दी। उसने अपने मन्दिर में मेरी वाणी सुनी, मेरी दुहाई उसके कान तक पहुँची। तब पृथ्वी विचलित हो कर काँपने लगी और पर्वतों की नींव हिलने लगी। उसका क्रोध भड़क उठा और वे काँपने लगे। उसके नथनों से धुआँ उठा, भस्मकारी अग्नि और दहकते अंगारे उसके मुख से निकल पड़े। वह आकाश खोल कर उतरा; उसके चरणों तले घोर अन्धकार था। वह केरूब पर सवार हो कर उड़ गया; पवन के पंख उसे ले चले। वह अन्धकार ओढ़े था। वह काले घने बादलों से घिरा था। उसके मुखमण्डल के तेज से बादल हटते जा रहे थे- औले और दहकते अंगारे झरने लगे। प्रभु आकाश में गरज उठा, सर्वोच्च ईश्वर की वाणी सुनाई पड़ी-ओले और दहकते अंगारे झरने लगे। उसने बाण चला कर शत्रुओं को तितर-बितर कर दिया, बिजली चमका कर उन्हें भगा दिया। प्रभु! तेरी धमकी के गर्जन से, तेरी क्रोधभरी फुंकार से महासागर का तल दिखाई पड़ा, पृथ्वी की नींव प्रकट हो गयी। वह ऊपर से हाथ बढ़ा कर मुझे संभालता और महासागर से मुझे निकाल लेता है, मुझे मेरे शक्तिशाली शत्रुओं से छुड़ाता है, उन विरोधियों से, जो मुझ से प्रबल है। वे संकट के समय मुझ पर आक्रमण करते थे, परन्तु प्रभु मेरा सहायक बना। वह मुझे संकट में से निकाल लाया, उसने मुझे छुड़ाया, क्योंकि वह मुझे प्यार करता है।”

प्रभु ईश्वर पर भरोसा करने वाले किसी भी व्यक्ति को इस जीवन में हार नहीं मानना चाहिए। उसका अनन्त आशा पर अधिकार है। उसके लिए मृत्यु भी अन्त नहीं है। आईए हम जीवन में आशावान बने तथा एक सार्थक जीवन बिताने की कोशिश करें।

✍ - फ़ादर फ़्रांसिस स्करिया